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“UP में बदलने वाला है सियासी खेल? मायावती से मिलने पहुंचे कांग्रेस नेता, अखिलेश की बढ़ सकती है टेंशन!”

उत्तर प्रदेश: की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इसकी वजह बनी कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ दलित नेताओं की लखनऊ में बीएसपी सुप्रीमो मायावती से मुलाकात की कोशिश। हालांकि यह मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन इस घटना ने यूपी की सियासत में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

मंगलवार शाम कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष व बाराबंकी सांसद तनुज पुनिया सहित कुछ अन्य नेता मायावती के आवास पहुंचे थे। बताया गया कि नेताओं ने मायावती का हालचाल जानने के लिए वहां जाने की बात कही। लेकिन मायावती उस समय आवास पर मौजूद नहीं थीं और कांग्रेस नेताओं को वापस लौटना पड़ा।

इस मुलाकात की कोशिश ने इसलिए ज्यादा चर्चा बटोरी क्योंकि उसी समय कांग्रेस नेता राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के दौरे पर थे और दलित-वंचित वर्गों को साधने की रणनीति पर काम कर रहे थे। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे कि क्या कांग्रेस समाजवादी पार्टी से दूरी बनाकर बीएसपी के साथ नए समीकरण तलाश रही है?

बाराबंकी सांसद तनुज पुनिया ने सफाई देते हुए कहा कि यह केवल शिष्टाचार मुलाकात थी। उन्होंने बताया कि कांग्रेस कार्यालय में अनुसूचित जाति विभाग की बैठक के बाद किसी ने मायावती के स्वास्थ्य का जिक्र किया। चूंकि उनका आवास पास में था, इसलिए नेताओं ने हालचाल जानने का फैसला किया। पुनिया ने कहा कि मायावती दलित समाज की बड़ी नेता हैं और उम्रदराज भी हो चुकी हैं, इसलिए उनसे मिलने जाना स्वाभाविक था।

हालांकि कांग्रेस संगठन ने इस पूरे मामले से दूरी बना ली। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने साफ कहा कि यह नेताओं का निजी कार्यक्रम था और पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि संभव है कि नेताओं के मायावती या उनके परिवार से व्यक्तिगत संबंध हों और उसी आधार पर वे मिलने गए हों।

मामला तब और गंभीर हो गया जब कांग्रेस के यूपी प्रभारी अविनाश पांडे ने इस पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि यह पार्टी का अधिकृत प्रतिनिधिमंडल नहीं था और पार्टी ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। कांग्रेस ने मायावती से मिलने गए नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। पांडे ने यह भी कहा कि कांग्रेस मायावती का सम्मान करती है, लेकिन पार्टी की ओर से किसी को भी आधिकारिक तौर पर नहीं भेजा गया था।

इस पूरे घटनाक्रम का समय भी बेहद अहम माना जा रहा है। दरअसल, कुछ घंटे पहले ही समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने बयान दिया था कि कांग्रेस और सपा का गठबंधन 2027 के विधानसभा चुनाव तक जारी रहेगा। अखिलेश ने कहा था कि गठबंधन का फोकस सीटों पर नहीं, बल्कि जीत पर रहेगा। उन्होंने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को यूपी चुनाव की सबसे बड़ी ताकत बताया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस और सपा दोनों ही दलित वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी भी हाल के दिनों में लगातार दलित और वंचित समुदायों के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। रायबरेली में आयोजित ‘बहुजन स्वाभिमान सभा’ इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। इस कार्यक्रम में राहुल गांधी ने स्वतंत्रता सेनानी वीरा पासी की प्रतिमा का अनावरण किया और सामाजिक समानता व संविधान की रक्षा का मुद्दा उठाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कांग्रेस और बीएसपी के बीच भविष्य में कोई समझदारी बनती है तो इससे यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। हालांकि फिलहाल बीएसपी ने इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन कांग्रेस नेताओं की मायावती से मुलाकात की कोशिश ने यह संकेत जरूर दिया है कि विपक्षी राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

दूसरी तरफ भाजपा भी यूपी में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए लगातार सामाजिक समीकरणों पर काम कर रही है। ऐसे में विपक्ष के अंदर होने वाली हर हलचल राजनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है।

मायावती से मिलने पहुंचे कांग्रेस नेताओं की कोशिश ने यूपी की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। हालांकि कांग्रेस ने इसे नेताओं का निजी कदम बताया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे संभावित नए गठबंधन की आहट के रूप में देखा जा रहा है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित और पिछड़ा वोट बैंक को लेकर विपक्षी दलों की रणनीति अब और दिलचस्प होती दिखाई दे रही है।

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