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“क्या भारत भी चीन के रास्ते पर? जन्म दर में रिकॉर्ड गिरावट से बढ़ी चिंता, एलन मस्क ने भी जताई फिक्र”

नई दिल्ली। कभी दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में गिने जाने वाला भारत अब एक नए जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) घटकर 1.9 पर पहुंच गई है, जो रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे है। इस बदलाव ने न केवल जनसंख्या विशेषज्ञों बल्कि वैश्विक अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं का भी ध्यान आकर्षित किया है।

टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने भी भारत की घटती जन्म दर को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो आने वाले दशकों में भारत को भी उन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है जिनसे आज चीन, जापान और कई यूरोपीय देश जूझ रहे हैं।

क्या होता है रिप्लेसमेंट लेवल?

रिप्लेसमेंट लेवल फर्टिलिटी रेट वह स्तर होता है जिस पर एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को संख्या के लिहाज से पूरी तरह प्रतिस्थापित कर सके। आमतौर पर यह दर 2.1 मानी जाती है।

जब किसी देश की फर्टिलिटी रेट इससे नीचे चली जाती है तो लंबे समय में जनसंख्या वृद्धि धीमी पड़ने लगती है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो आबादी स्थिर हो सकती है या घट भी सकती है।

क्यों घट रही है भारत की जन्म दर?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में प्रजनन दर में गिरावट कई सामाजिक और आर्थिक बदलावों का परिणाम है।

सबसे बड़ा कारण तेजी से बढ़ता शहरीकरण है। शहरों में जीवन-यापन का खर्च गांवों की तुलना में काफी अधिक है। महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, आवास और बच्चों की परवरिश की लागत ने परिवारों को छोटे परिवार की ओर प्रेरित किया है।

इसके अलावा महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ती भागीदारी भी महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है। आज अधिक महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। इसका असर विवाह और मातृत्व की उम्र पर भी पड़ रहा है।

बदल रही है नई पीढ़ी की सोच

पहले जहां बड़े परिवार सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक माने जाते थे, वहीं अब युवा दंपती एक या दो बच्चों तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं। आर्थिक स्थिरता, बेहतर जीवनशैली और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की इच्छा ने भी परिवारों का आकार छोटा कर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक साधनों की बढ़ती उपलब्धता तथा जागरूकता ने भी जन्म दर को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई है।

क्या भारत को चीन जैसी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है?

चीन आज तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और घटती कार्यशील जनसंख्या की समस्या से जूझ रहा है। वर्षों तक लागू रही “वन चाइल्ड पॉलिसी” के कारण वहां जन्म दर में भारी गिरावट आई, जिसका असर अब अर्थव्यवस्था और श्रम बाजार पर दिखाई दे रहा है।

भारत की स्थिति फिलहाल चीन जैसी नहीं है क्योंकि देश में अभी भी बड़ी युवा आबादी मौजूद है। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जन्म दर लगातार गिरती रही तो आने वाले दशकों में भारत को भी श्रमिकों की कमी, पेंशन बोझ और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

कम जन्म दर का सबसे बड़ा प्रभाव भविष्य की कार्यशील आबादी पर पड़ सकता है। जब युवा आबादी कम होगी तो उद्योगों, सेवाओं और उत्पादन क्षेत्रों में श्रमिकों की संख्या घट सकती है।

इसके साथ ही बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और पेंशन व्यवस्था पर खर्च बढ़ सकता है। इससे सरकारों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ सकता है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे सकारात्मक बदलाव भी मानते हैं। उनका कहना है कि कम आबादी से संसाधनों पर दबाव कम होगा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि संभव है।

क्या है आगे की चुनौती?

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है। देश को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और जनसंख्या संरचना के बीच संतुलन स्थापित कर सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक होगा।

भारत की घटती प्रजनन दर एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक बदलाव दर्शाती है। यह एक तरफ बेहतर शिक्षा, जागरूकता और आर्थिक प्रगति का संकेत है, तो दूसरी तरफ भविष्य में श्रमबल की कमी और बुजुर्ग आबादी बढ़ने जैसी चुनौतियों की चेतावनी भी देती है। फिलहाल भारत के पास अपनी जनसांख्यिकीय ताकत का लाभ उठाने का अवसर है, लेकिन इसके लिए दूरदर्शी नीतियों और संतुलित विकास की आवश्यकता होगी।

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