नई दिल्ली। महाकुंभ 2025 के दौरान सोशल मीडिया पर अचानक चर्चा में आईं मोनालिसा भोसले एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार वजह उनका वायरल वीडियो नहीं, बल्कि उनकी शादी और उससे जुड़ा कानूनी विवाद है। केरल हाई कोर्ट में मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने पूरे मामले को और ज्यादा चर्चित बना दिया।
मोनालिसा भोसले और उनके पति मोहम्मद फरमान खान ने अग्रिम जमानत के लिए केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अदालत में सुनवाई के दौरान जस्टिस कौसर एडापगाथ की एक टिप्पणी ने सबका ध्यान खींच लिया। जब याचिकाकर्ता पक्ष के वकील ने मध्य प्रदेश में दंपती को मिल रही कथित धमकियों का जिक्र किया तो न्यायाधीश ने कहा, “आप खुशकिस्मत हैं कि आप केरल में हैं।”
इस टिप्पणी के बाद अदालत में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। वहीं दंपती के वकील ने जवाब देते हुए कहा कि यही वजह है कि वे आज सुरक्षित और जीवित हैं।
कुंभ मेले से शुरू हुई पहचान
मोनालिसा भोसले पहली बार उस समय चर्चा में आई थीं जब महाकुंभ मेले में मोतियों की माला बेचते हुए उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। उनकी सादगी और व्यक्तित्व ने लाखों लोगों का ध्यान आकर्षित किया। देखते ही देखते वह सोशल मीडिया सेंसेशन बन गईं।
इसी दौरान उनकी मुलाकात मोहम्मद फरमान खान से हुई। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। हालांकि शादी के बाद यह मामला विवादों में आ गया।

शादी के बाद क्यों शुरू हुआ विवाद?
विवाद की मुख्य वजह मोनालिसा की उम्र को लेकर उठे सवाल हैं। कुछ संगठनों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि शादी के समय मोनालिसा कानूनी विवाह योग्य आयु से कम थीं। इसी आधार पर पूरे विवाह की वैधता पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
दंपती की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम. ससिंद्रन ने अदालत में दावा किया कि कुछ कट्टरपंथी समूह और प्रशासनिक तत्व जानबूझकर मोनालिसा को नाबालिग साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि विवाह के समय मोनालिसा बालिग थीं और बाद में सरकारी रिकॉर्ड में कथित रूप से बदलाव किए गए।
मध्य प्रदेश सरकार ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दंपती की दलीलों का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार मोनालिसा की जन्मतिथि दिसंबर 2009 दर्ज है।
यदि यह रिकॉर्ड सही माना जाता है तो विवाह के समय उनकी आयु कानूनी विवाह आयु से कम थी। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि मुस्लिम युवक द्वारा हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न कराया गया विवाह कानूनी परीक्षण का विषय हो सकता है।
कोर्ट ने उठाए अहम सवाल
हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की कुछ दलीलों पर सवाल भी उठाए। न्यायालय ने पूछा कि जिस युवती को कथित पीड़िता बताया जा रहा है, उसने स्वयं अपने पति के खिलाफ कोई शिकायत क्यों नहीं की।
कोर्ट की यह टिप्पणी मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे जांच की दिशा और कानूनी बहस दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
दो राज्यों में चल रही कानूनी लड़ाई
यह मामला अब केवल केरल तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश और केरल दोनों राज्यों में कानूनी प्रक्रिया जारी है।
तिरुवनंतपुरम की POCSO अदालत में भी एक शिकायत दायर की गई है। शिकायत में फरमान खान के अलावा कुछ राजनीतिक नेताओं के नाम भी शामिल किए गए हैं। आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से इस विवाह में सहायता की थी।
फैसला क्या बदल सकता है?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट का आगामी फैसला केवल इस दंपती के लिए ही नहीं बल्कि ऐसे मामलों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जहां उम्र, विवाह की वैधता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दे आपस में टकराते हैं।
फिलहाल केरल हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है और उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही अदालत अपना आदेश सुना सकती है। पूरे देश की नजर अब इसी फैसले पर टिकी हुई है।