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Trump के एक फैसले से धड़ाम हुए कच्चे तेल के दाम! क्या भारत में सस्ता होगा पेट्रोल-डीजल?

वैश्विक बाजार: में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई बड़ी गिरावट ने दुनियाभर के निवेशकों और तेल आयात करने वाले देशों को राहत दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को टालने के संकेत के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी WTI क्रूड की कीमतों में 2% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई।

पिछले कई दिनों से पश्चिम एशिया यानी मिड-ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक बाजार में डर का माहौल था। निवेशकों को आशंका थी कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधा सैन्य संघर्ष शुरू हुआ, तो दुनिया की तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

लेकिन ट्रंप के नरम रुख के बाद बाजार में अचानक राहत देखने को मिली।

क्यों बढ़ गया था युद्ध का डर?

विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने बाजार में ‘वॉर प्रीमियम’ बढ़ा दिया था। इसका मतलब यह है कि निवेशक संभावित युद्ध के खतरे को देखते हुए तेल की कीमतों में अतिरिक्त जोखिम जोड़ने लगे थे।

अगर मिड-ईस्ट में युद्ध जैसी स्थिति बनती, तो होर्मुज स्ट्रेट के जरिए होने वाली तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती थी। दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है।

ऐसी स्थिति में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती थीं।

ट्रंप के बयान के बाद बाजार क्यों गिरा?

जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने सैन्य कार्रवाई की बजाय बातचीत और कूटनीतिक समाधान की तरफ संकेत दिए, बाजार में युद्ध की आशंका कम हो गई।

इसके तुरंत बाद:

  • ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट आई
  • अमेरिकी WTI क्रूड भी फिसला
  • निवेशकों ने राहत की सांस ली
  • वैश्विक शेयर बाजारों में भी स्थिरता दिखी

कमोडिटी मार्केट विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार फिलहाल मिड-ईस्ट की स्थिति पर बेहद करीबी नजर बनाए हुए है।

अब आगे कहां जाएंगे तेल के दाम?

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की दिशा कई बड़े फैक्टर्स पर निर्भर करेगी।

1. अमेरिका-ईरान संबंध

अगर दोनों देशों के बीच तनाव और कम होता है, तो तेल की कीमतें 80-85 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में स्थिर हो सकती हैं।

2. OPEC+ का फैसला

OPEC और उसके सहयोगी देशों की सप्लाई पॉलिसी भी कीमतों को प्रभावित करेगी।

3. चीन और अमेरिका की मांग

अगर वैश्विक औद्योगिक मांग कमजोर रहती है, तो कच्चे तेल के दामों में और गिरावट संभव है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। देश अपनी जरूरत का करीब 80% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

क्या होगा फायदा?

  • भारत का आयात बिल घट सकता है
  • रुपये पर दबाव कम होगा
  • महंगाई नियंत्रित हो सकती है
  • तेल कंपनियों का घाटा कम होगा

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें लगातार नीचे रहती हैं, तो आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में राहत मिल सकती है।

तेल कंपनियों को भी मिलेगी राहत

Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी भारतीय तेल कंपनियों को भी इसका बड़ा फायदा हो सकता है।

कच्चा तेल सस्ता होने से इन कंपनियों की लागत घटेगी और सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी कम हो सकता है।

आम जनता को कब मिलेगी राहत?

हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत कम नहीं होते।

सरकार और तेल कंपनियां टैक्स, डॉलर-रुपया विनिमय दर और अन्य खर्चों को ध्यान में रखकर कीमतें तय करती हैं।

लेकिन यदि कच्चा तेल लंबे समय तक सस्ता बना रहता है, तो आम लोगों को राहत मिलने की संभावना काफी बढ़ जाएगी।

डोनाल्ड ट्रंप के एक फैसले ने फिलहाल वैश्विक तेल बाजार में तनाव कम कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत भरी खबर है। आने वाले दिनों में अगर मिड-ईस्ट तनाव और कम होता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों में भी राहत देखने को मिल सकती है।

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