उत्तर प्रदेश: में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य में पंचायत चुनाव का समय पर होना अब लगभग असंभव माना जा रहा है। ताजा जानकारी के मुताबिक, अब ये चुनाव अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जा सकते हैं। इससे साफ है कि प्रदेश में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों का नया गठन तय समय पर नहीं हो पाएगा।
वर्तमान पंचायतों का कार्यकाल क्रमशः 26 मई, 19 जुलाई और 11 जुलाई को समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में नई पंचायतों के गठन की प्रक्रिया को समय रहते पूरा करना प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है। हालांकि, चुनाव की दिशा में कुछ औपचारिक प्रक्रियाएं जारी हैं, जैसे कि अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 15 अप्रैल तक होना तय है। लेकिन इसके बाद भी कई महत्वपूर्ण चरण ऐसे हैं, जिनके पूरा होने में समय लगेगा।
सबसे बड़ी अड़चन आरक्षण प्रक्रिया को लेकर है। पंचायत चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन जरूरी होता है, जो अभी तक नहीं किया गया है। यह आयोग विभिन्न जिलों में जाकर ओबीसी आबादी का आंकलन करता है और उसी के आधार पर आरक्षण तय किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगता है, जिससे चुनाव कार्यक्रम और आगे खिसक सकता है।
सूत्रों के अनुसार, मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार के पास पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल बढ़ाने का विकल्प ही बचता है। यदि इसमें कोई कानूनी बाधा आती है, तो फिर पंचायतों में प्रशासकों की नियुक्ति भी की जा सकती है, जैसा पहले भी किया जा चुका है।

राजनीतिक दृष्टि से भी फिलहाल पंचायत चुनाव को लेकर ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई दे रही है। सत्तारूढ़ दल सहित प्रमुख विपक्षी दल भी अपना ध्यान 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर केंद्रित किए हुए हैं। यही कारण है कि पंचायत चुनाव को लेकर किसी भी बड़े दल की ओर से जोरदार मांग नहीं उठाई जा रही है।
इस बीच मामला न्यायालय तक भी पहुंच चुका है। पंचायत चुनाव समय पर कराने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब मतदाता सूची ही अप्रैल के मध्य तक फाइनल होगी, तो आरक्षण और अन्य प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त समय नहीं बचेगा। ऐसे में चुनाव टलना लगभग तय है।
कोर्ट ने इस मामले में राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब भी मांगा है। आयोग ने अपना एफिडेविट दाखिल कर दिया है, जिसमें तैयारियों की स्थिति स्पष्ट की गई है। अब इस पूरे मामले में अंतिम फैसला न्यायालय के रुख पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर, प्रशासनिक तैयारियों की कमी, आरक्षण प्रक्रिया में देरी और राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव फिलहाल टलते नजर आ रहे हैं। यह स्थिति प्रदेश की स्थानीय शासन व्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती है।