नई दिल्ली: में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सबरीमाला मंदिर केस की सुनवाई के पांचवें दिन बहस और भी तीखी हो गई। आस्था, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर कोर्ट में गहन चर्चा हुई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कोर्ट के सामने अहम तर्क रखते हुए कहा कि “आस्था और विश्वास समय के साथ बदलते हैं, लेकिन इन्हें किसी कानून के जरिए नहीं बदला जा सकता। यह बदलाव समाज के भीतर से आता है।”
आस्था बनाम कानून: बहस का केंद्र
धवन ने अपने तर्क में स्पष्ट किया कि धार्मिक विश्वास किसी आदेश से नहीं, बल्कि लोगों की सोच और सामाजिक बदलाव से विकसित होते हैं। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल मंदिर में प्रवेश का नहीं, बल्कि पूजा करने के अधिकार और व्यक्तिगत चयन का भी है।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी श्रद्धालु को यह कह देना कि वह किसी अन्य मंदिर में चला जाए, इस समस्या का समाधान नहीं है। “अगर कोई व्यक्ति किसी खास मंदिर को महत्वपूर्ण मानता है, तो उसे वहां पूजा करने का अधिकार मिलना चाहिए,” उन्होंने जोड़ा।
सुप्रीम कोर्ट के कठिन सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने कई अहम सवाल उठाए। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने पूछा कि क्या अदालत केवल उसी व्यक्ति को याचिका दायर करने का अधिकार दे, जो सीधे तौर पर प्रभावित हो?
इसके साथ ही यह सवाल भी उठा कि क्या कोई गैर-आस्तिक व्यक्ति किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस अमानुल्लाह ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन को लेकर सवाल उठाए। कोर्ट ने यह समझने की कोशिश की कि धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों के बीच कैसे तालमेल बैठाया जाए।

मंदिर प्रशासन का विरोध
दूसरी ओर, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने महिलाओं की एंट्री का विरोध करते हुए कहा कि सबरीमाला मंदिर कोई सार्वजनिक स्थान नहीं है, बल्कि इसकी अपनी धार्मिक परंपराएं हैं।
बोर्ड का तर्क है कि यहां भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है, और इसी कारण 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पारंपरिक रूप से रोक रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश में अयप्पा के करीब 1,000 मंदिर हैं, जहां महिलाएं दर्शन कर सकती हैं, इसलिए केवल इसी मंदिर पर जोर देना उचित नहीं है।
2018 के फैसले से अब तक का सफर
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ऐतिहासिक फैसला देते हुए सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी।
2018 के फैसले के बाद देशभर में विरोध और समर्थन दोनों देखने को मिले। इसके खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब विस्तृत सुनवाई चल रही है।
पिछली सुनवाई में क्या हुआ
सुनवाई के पिछले दिनों में केंद्र सरकार और अन्य पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे।
- केंद्र ने कहा कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
- कोर्ट ने यह भी कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना आसान नहीं है।
- मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी रेस्टोरेंट या सार्वजनिक सुविधा जैसा नहीं है।
संविधान बनाम परंपरा की जंग
यह मामला अब केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे देश में धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों की बहस का केंद्र बन चुका है।
एक ओर महिलाओं के समान अधिकार की बात है, तो दूसरी ओर धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं को बनाए रखने की दलील दी जा रही है।
कोर्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाए।
सबरीमाला केस की सुनवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल एक धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि समाज और संविधान के बीच संतुलन का बड़ा सवाल है। अदालत का अंतिम फैसला यह तय करेगा कि आस्था और कानून के बीच सीमाएं कहां तय होती हैं और आधुनिक भारत में धार्मिक परंपराओं की क्या भूमिका होगी।