नई दिल्ली: में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों पर लोकसभा में जोरदार बहस देखने को मिल रही है। सत्ता पक्ष जहां इसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष ने इस पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए इसके मौजूदा स्वरूप का विरोध किया है। खासतौर पर लोकसभा सीटों की संख्या 850 करने के प्रस्ताव और परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर सियासी टकराव तेज हो गया है।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेता अखिलेश यादव ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी “नारी को नारा” बनाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह चाहती है कि यह व्यवस्था सामाजिक न्याय के साथ लागू हो। उन्होंने मांग की कि आरक्षण में पिछड़े वर्ग और मुस्लिम महिलाओं को भी शामिल किया जाए।
अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार जनगणना को टाल रही है और बिना ठोस आंकड़ों के परिसीमन लागू करने की जल्दबाजी कर रही है। उनके मुताबिक, इससे राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं को बराबरी का हक मिलना चाहिए, लेकिन यह तभी संभव है जब सभी वर्गों को न्याय मिले।
दूसरी ओर, कांग्रेस की तरफ से भी सरकार को घेरा गया। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने सवाल उठाया कि लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का आधार क्या है। उन्होंने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर स्पष्ट जानकारी नहीं दे रही और केवल पुरानी बातों को दोहरा रही है।
गोगोई ने यह भी कहा कि कांग्रेस महिला आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन इसे परिसीमन के साथ जोड़ना गलत है। उनका तर्क है कि इससे कानून के लागू होने में देरी होगी और महिलाओं को तत्काल लाभ नहीं मिल पाएगा।.

वहीं, केंद्र सरकार की ओर से इस विधेयक का जोरदार बचाव किया गया। गृह मंत्री अमित शाह ने अखिलेश यादव के मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रस्ताव को असंवैधानिक बताया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी चाहे तो अपने टिकट मुस्लिम महिलाओं को दे सकती है।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस विधेयक को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इससे महिलाओं को राजनीति में समान अवसर मिलेगा और लोकतंत्र और मजबूत होगा।
बहस के दौरान परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 की जा सकती है, जिसमें राज्यों को 815 और केंद्र शासित प्रदेशों को 35 सीटें मिलेंगी। इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि परिसीमन की प्रक्रिया के जरिए कुछ राज्यों को नुकसान और कुछ को फायदा पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है। दक्षिण भारत के कई दलों ने भी इस पर चिंता जताई है और कहा है कि इससे उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
DMK सहित कई क्षेत्रीय दलों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि महिला आरक्षण को मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही लागू किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि इसे परिसीमन से जोड़ना अनावश्यक जटिलता पैदा करता है।
लोकसभा में इन तीनों विधेयकों पर कुल 15 घंटे की चर्चा तय की गई है, जो 16 और 17 अप्रैल को होगी। इसके बाद 17 अप्रैल को शाम 4 बजे वोटिंग कराई जाएगी, जिसमें तय होगा कि ये संशोधन विधेयक पारित होते हैं या नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ सामाजिक सुधार का नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। जहां एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक बदलाव बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति करार दे रहा है।
महिला आरक्षण बिल पर लोकसभा में जारी बहस ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। समर्थन और विरोध के बीच असली मुद्दा अब इसके लागू होने के तरीके पर केंद्रित है। आने वाली वोटिंग इस बहस की दिशा तय करेगी।