पश्चिम एशिया: में जारी तनाव के बीच इस्लामाबाद में होने जा रही अमेरिका और ईरान की अहम शांति वार्ता से पहले एक बेहद भावनात्मक और रणनीतिक कदम सामने आया है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने इस वार्ता से ठीक पहले ऐसा संदेश दिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है।
दरअसल, गालिबाफ जब इस्लामाबाद के लिए रवाना हुए, तो उनके विमान की खाली सीटों पर मिनाब स्कूल हमले में मारे गए बच्चों और कर्मचारियों की तस्वीरें रखी गई थीं। यह दृश्य न केवल भावनात्मक था, बल्कि अमेरिका के लिए एक स्पष्ट संदेश भी था कि ईरान इस वार्ता में अपने नागरिकों की पीड़ा और न्याय की मांग को प्रमुखता से उठाएगा।
क्या है मिनाब स्कूल हमला?
28 फरवरी 2026 को ईरान के मिनाब शहर में एक प्राथमिक स्कूल पर कथित अमेरिकी हमले में 165 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें बड़ी संख्या में मासूम बच्चे और स्कूल स्टाफ शामिल थे। इस घटना ने ईरान में भारी आक्रोश पैदा कर दिया था और अमेरिका-ईरान संबंधों में और अधिक तनाव ला दिया।
गालिबाफ ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इन पीड़ितों को “मिनाब168” के नाम से संबोधित किया और लिखा—“इस उड़ान में मेरे साथी।” यह शब्द सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक संदेश भी था।

वार्ता से पहले दबाव की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान की एक सोची-समझी रणनीति है। शांति वार्ता से पहले भावनात्मक माहौल बनाकर ईरान अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करना चाहता है और अमेरिका पर नैतिक दबाव बनाना चाहता है।
इस्लामाबाद में होने वाली इस बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि लंबे समय बाद दोनों देश सीधे संवाद की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों के बीच अविश्वास की गहरी खाई अब भी मौजूद है।
‘अच्छी नीयत, लेकिन भरोसा नहीं’
इस्लामाबाद पहुंचने के बाद गालिबाफ ने साफ कहा कि ईरान वार्ता में “अच्छी नीयत” के साथ शामिल हो रहा है, लेकिन उसे अमेरिका पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि पिछले अनुभव बताते हैं कि अमेरिका अक्सर समझौतों का उल्लंघन करता रहा है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर इस बार भी वार्ता का इस्तेमाल किसी धोखे के लिए किया गया, तो ईरान कड़ा जवाब देगा।
अमेरिका के सामने बड़ी चुनौती
इस वार्ता में अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईरान के भरोसे को जीतना होगा। ईरान लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दबाव झेल रहा है, जबकि अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी गतिविधियों पर नियंत्रण लगाए।
इसके अलावा, इजराइल का मुद्दा भी इस वार्ता में अहम भूमिका निभा सकता है। ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि अगर क्षेत्र में उसके सहयोगियों पर हमला हुआ, तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा।
क्या निकलेगा कोई हल?
विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक से किसी बड़े समझौते की उम्मीद कम है, लेकिन यह बातचीत भविष्य के लिए रास्ता जरूर खोल सकती है। दोनों देशों के बीच सीधे संवाद की शुरुआत ही एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
गालिबाफ का यह भावनात्मक कदम इस बात का संकेत है कि ईरान इस बार सिर्फ कूटनीति ही नहीं, बल्कि जनभावनाओं को भी वार्ता का हिस्सा बना रहा है।
इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान शांति वार्ता से पहले गालिबाफ का यह कदम कूटनीतिक रणनीति और भावनात्मक अपील का अनोखा मिश्रण है। इससे साफ है कि ईरान इस बार वार्ता में मजबूत और संवेदनशील दोनों पहलुओं के साथ उतरा है। अब देखना होगा कि यह भावनात्मक दबाव अमेरिका पर कितना असर डालता है और क्या इससे कोई ठोस समाधान निकल पाता है।