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भारत-रूस का ‘मिलिट्री मेगा डील’! 3000-3000 सैनिक तैनात होंगे, फाइटर जेट और युद्धपोत भी भेजने की तैयारी

भारत और रूस: के बीच रक्षा सहयोग एक नए और अहम दौर में प्रवेश कर चुका है। दोनों देशों के बीच हुआ RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Support) समझौता अब प्रभावी हो गया है, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की जमीन पर अपने सैनिक, युद्धपोत और लड़ाकू विमान तैनात कर सकेंगे। यह कदम न केवल द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन पर भी असर डाल सकता है।

इस समझौते के तहत भारत और रूस अधिकतम 3000-3000 सैनिकों को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों पर तैनात कर सकते हैं। इसके अलावा, दोनों देश पांच युद्धपोत और 10 लड़ाकू विमान भी एक-दूसरे के यहां भेज सकेंगे। यह समझौता फिलहाल पांच साल के लिए लागू रहेगा, जिसे भविष्य में बढ़ाया भी जा सकता है।

क्या है RELOS समझौता?

RELOS यानी ‘परस्पर रसद आदान-प्रदान समझौता’ एक ऐसा रक्षा समझौता है, जो दोनों देशों को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों और एयरबेस का उपयोग करने की अनुमति देता है। इसके तहत ईंधन, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स और अन्य जरूरी संसाधनों का आदान-प्रदान भी किया जा सकेगा।

इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लंबी दूरी के सैन्य अभियानों के दौरान समय और लागत दोनों में कमी आएगी। युद्ध और शांति—दोनों स्थितियों में यह व्यवस्था लागू रहेगी।

आर्कटिक में भारत की बढ़ेगी पहुंच

इस समझौते का एक बड़ा रणनीतिक पहलू आर्कटिक क्षेत्र से जुड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत को रूस के मरमांस्क और सेवेरोमोर्स्क जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों तक पहुंच मिल सकती है।

आर्कटिक क्षेत्र तेजी से वैश्विक रणनीतिक केंद्र बनता जा रहा है, जहां चीन और रूस अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ऐसे में भारत की इस क्षेत्र में एंट्री उसे वैश्विक शक्ति संतुलन में और मजबूत बनाएगी।

हिंद महासागर में रूस को मिलेगा फायदा

जहां भारत को आर्कटिक में रणनीतिक बढ़त मिलेगी, वहीं रूस को हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना के सहयोग से फायदा होगा। रूस अपने युद्धपोतों और विमानों के लिए भारतीय ठिकानों का इस्तेमाल कर सकेगा, जिससे उसकी ऑपरेशनल क्षमता में इजाफा होगा।

अमेरिका के साथ भी है ऐसा समझौता

गौरतलब है कि भारत ने अमेरिका के साथ भी LEMOA (Logistics Exchange Memorandum of Agreement) नाम का एक समान समझौता किया हुआ है। हालांकि, RELOS इससे एक कदम आगे है, क्योंकि इसमें सैनिकों की तैनाती और वस्तु विनिमय (बार्टर सिस्टम) का प्रावधान भी शामिल है।

यह भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ विदेश नीति को दर्शाता है, जिसमें वह विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है।

S-400 और रक्षा सहयोग

भारत-रूस रक्षा संबंधों की मजबूती का एक बड़ा उदाहरण S-400 मिसाइल सिस्टम भी है। रूस भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 36% है।

भारत को पहले ही S-400 की तीन बैटरियां मिल चुकी हैं, जबकि बाकी की डिलीवरी प्रक्रिया जारी है। इससे भारत की एयर डिफेंस क्षमता और मजबूत होगी।

ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्ते

भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने और बेहद मजबूत रहे हैं। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और कूटनीति जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच गहरा सहयोग है।

दोनों देश BRICS, SCO और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। यह साझेदारी एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम भूमिका निभा रही है।

RELOS समझौते के लागू होने के साथ भारत और रूस के रक्षा संबंध एक नई ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। सैनिकों की तैनाती, युद्धपोत और लड़ाकू विमानों की साझेदारी से दोनों देशों की सैन्य ताकत और रणनीतिक पहुंच में बड़ा इजाफा होगा। आने वाले समय में यह समझौता वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।

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