नई दिल्ली: में चल रही सबरीमाला मंदिर विवाद की सुनवाई एक बार फिर देशभर में बहस का केंद्र बन गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर गहन चर्चा के दौरान धार्मिक आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर तीखा टकराव देखने को मिल रहा है।
केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद पर मंदिर प्रबंधन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने स्पष्ट कहा कि “किसी भी धार्मिक प्रथा को सही या गलत ठहराने का अधिकार अदालत के पास नहीं होना चाहिए, यह उस समुदाय की आस्था से तय होता है।”
आस्था बनाम अधिकार: कोर्ट में क्या हो रही बहस?
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के बीच संतुलन पर चर्चा हो रही है।
अनुच्छेद 25 व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं और संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों को संचालित करने का अधिकार प्रदान करता है।
सुनवाई के दौरान जजों ने सवाल उठाया कि क्या किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार व्यक्तिगत अधिकारों से ऊपर हो सकते हैं? क्या कानून केवल व्यक्तियों पर लागू होगा या पूरे समुदाय पर भी?
इस पर सिंघवी ने दलील दी कि धार्मिक संप्रदायों के अधिकार अधिक मजबूत हैं और उन्हें बाहरी हस्तक्षेप से बचाया जाना चाहिए।
महिलाओं की एंट्री पर क्यों है विवाद?
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लंबे समय से विवाद रहा है। केरल हाईकोर्ट ने 1991 में इस पर प्रतिबंध लगाया था, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भेदभावपूर्ण बताते हुए हटा दिया।
हालांकि, इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिनके आधार पर अब सात महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर पुनः सुनवाई हो रही है।
मंदिर पक्ष का तर्क है कि यह परंपरा भगवान अयप्पा की ब्रह्मचर्य आस्था से जुड़ी है, जिसे बदलना धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप होगा।

केंद्र सरकार का क्या रुख है?
केंद्र सरकार ने भी अदालत में यह तर्क रखा कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध है। इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
सरकार का मानना है कि यह मामला केवल समानता का नहीं बल्कि आस्था और परंपरा का भी है, जिसे संवैधानिक ढांचे में संतुलित तरीके से देखा जाना चाहिए।
कोर्ट की टिप्पणियां: संतुलन कैसे बने?
सुनवाई के दौरान जस्टिसों ने यह भी कहा कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर किसी धर्म की मूल पहचान को खत्म नहीं किया जा सकता।
एक जज ने टिप्पणी की कि “अगर समाज सुधार के नाम पर धार्मिक प्रथाओं को पूरी तरह बदल दिया जाए, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ हो सकता है।”
वहीं, यह भी कहा गया कि मंदिर जैसे सार्वजनिक धार्मिक स्थलों में प्रवेश से समाज में समानता का संदेश जाता है, और इससे भेदभाव कम होता है।
महत्वपूर्ण कानूनी सवाल
सुनवाई में कुछ अहम प्रश्नों पर चर्चा हो रही है:
- क्या कोर्ट यह तय कर सकता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “जरूरी” है?
- क्या सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक परंपराओं में बदलाव किया जा सकता है?
- क्या व्यक्तिगत अधिकार पूरे समुदाय की आस्था से ऊपर हो सकते हैं?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में देश की धार्मिक और संवैधानिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।
देशभर में बढ़ी चर्चा
इस मामले को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे महिलाओं के अधिकार और समानता से जोड़ रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं की रक्षा का मुद्दा मान रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने वाले वर्षों में धार्मिक मामलों में न्यायपालिका की भूमिका को परिभाषित करेगा।
सबरीमाला मामला केवल एक मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र में आस्था और संविधान के बीच संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि भविष्य में धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच रेखा कहां खींची जाएगी।