नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को उस समय हलचल मच गई जब बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने देश की प्रमुख ज्वेलरी और गोल्ड रिफाइनिंग कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL) के खिलाफ बड़ा अंतरिम आदेश जारी किया। नियामक ने कंपनी के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक राजेश मेहता पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए उन्हें कंपनी की प्रतिभूतियों में किसी भी प्रकार के लेन-देन से प्रतिबंधित कर दिया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सेबी ने वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच करीब 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित राजस्व हेरफेर की बात कही है। हालांकि कंपनी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए अपना पक्ष रखने की बात कही है।
आखिर क्या है पूरा मामला?
सेबी के अंतरिम आदेश के अनुसार, जांच में ऐसे कई लेन-देन सामने आए हैं जिन्हें नियामक ने गैर-वास्तविक (Non-Genuine Transactions) माना है। आरोप है कि कंपनी ने कई वर्षों तक अपने राजस्व को वास्तविकता से कहीं अधिक दिखाया और प्रमोटर समूह से जुड़ी इकाइयों के माध्यम से फंड के प्रवाह को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं रखी।
नियामक का कहना है कि कंपनी द्वारा रिपोर्ट किए गए कुल राजस्व का लगभग 99 प्रतिशत हिस्सा कथित रूप से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया हो सकता है। यदि ये आरोप भविष्य की जांच में सही साबित होते हैं तो यह भारतीय कॉरपोरेट इतिहास के सबसे बड़े अकाउंटिंग विवादों में से एक माना जा सकता है।
कौन हैं राजेश मेहता?
राजेश मेहता भारतीय ज्वेलरी उद्योग का एक जाना-पहचाना नाम रहे हैं। उनका जन्म 20 जून 1964 को बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने अपने भाई प्रशांत मेहता के साथ बेहद छोटे स्तर से कारोबार शुरू किया था।
बताया जाता है कि उन्होंने 1980 के दशक में अपने बड़े भाई से मात्र 1,200 रुपये उधार लेकर चांदी के आभूषणों का व्यवसाय शुरू किया। इसके बाद कंपनी ने धीरे-धीरे विस्तार किया और 1995 में आईपीओ के जरिए पूंजी बाजार में प्रवेश किया।
राजेश एक्सपोर्ट्स को वैश्विक पहचान तब मिली जब कंपनी ने 2015 में लगभग 400 मिलियन डॉलर में स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित गोल्ड रिफाइनरी वालकैम्बी (Valcambi) का अधिग्रहण किया। इस डील ने कंपनी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया।

सेबी ने क्यों लगाया प्रतिबंध?
सेबी का मानना है कि कंपनी के संचालन और वित्तीय निर्णयों में राजेश मेहता की केंद्रीय भूमिका रही है। जांच एजेंसी के अनुसार, वे कंपनी के प्रमुख निर्णयकर्ता हैं और रोजमर्रा के कार्यों पर उनका प्रत्यक्ष नियंत्रण है।
इसी आधार पर नियामक ने उन्हें अगले आदेश तक प्रतिभूतियों की खरीद, बिक्री या अन्य किसी प्रकार के बाजार लेन-देन से दूर रहने का निर्देश दिया है।
ऑडिटर्स की भूमिका भी जांच के घेरे में
मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू कंपनी के वैधानिक ऑडिटर्स से जुड़ा हुआ है। सेबी के आदेश में कहा गया है कि जांच के दौरान ऑडिट संबंधी दस्तावेज और वर्किंग पेपर उपलब्ध कराने में अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
नियामक का मानना है कि जांच में सहयोग न करना कई महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने आने से रोक सकता है। यही वजह है कि ऑडिट प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की भी विस्तृत समीक्षा की जा रही है।
निवेशकों और LIC पर क्या असर?
इस खबर का सबसे पहला असर शेयर बाजार में देखने को मिला। सेबी के आदेश के बाद राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बन गया और कंपनी के भविष्य को लेकर कई सवाल उठने लगे।
इस विवाद का असर भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) पर भी दिखाई दिया क्योंकि सार्वजनिक शेयरहोल्डिंग डेटा के अनुसार कंपनी में LIC की उल्लेखनीय हिस्सेदारी मौजूद है। बाजार में नकारात्मक धारणा बनने के कारण LIC के शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि LIC का पोर्टफोलियो बेहद विविध है और किसी एक निवेश का प्रभाव उसकी कुल वित्तीय स्थिति पर सीमित ही रहता है। फिर भी निवेशक इस मामले पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं।
आगे क्या होगा?
यह आदेश फिलहाल अंतरिम प्रकृति का है। यानी जांच अभी जारी है और कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। आने वाले दिनों में सेबी की विस्तृत जांच, कंपनी की प्रतिक्रिया और संभावित कानूनी कार्यवाही इस मामले की दिशा तय करेगी।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह मामला भारतीय कॉरपोरेट गवर्नेंस और वित्तीय रिपोर्टिंग मानकों पर बड़ी बहस को जन्म दे सकता है।
राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके चेयरमैन राजेश मेहता पर लगे 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित राजस्व हेरफेर के आरोपों ने भारतीय शेयर बाजार को झकझोर दिया है। सेबी की कार्रवाई ने निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है, जबकि कंपनी सभी आरोपों से इनकार कर रही है। अब सभी की निगाहें जांच के अगले चरण और संभावित कानूनी परिणामों पर टिकी हैं। यह मामला न केवल कंपनी बल्कि पूरे कॉरपोरेट सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकता है।