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CBSE की नई 3 भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! ‘दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य’ नियम से छात्रों में हलचल, केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली: देशभर के लाखों छात्रों और अभिभावकों के बीच चर्चा का विषय बनी CBSE की नई 3 भाषा नीति अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। कक्षा 9 से लागू होने जा रही इस नई व्यवस्था में छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। इस नीति को लेकर दायर याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, CBSE और NCERT से जवाब मांगा है। हालांकि अदालत ने फिलहाल इस नीति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने मामले को गंभीर मानते हुए विस्तृत सुनवाई की जरूरत बताई। अदालत ने कहा कि इस नीति के संवैधानिक और व्यावहारिक पहलुओं की गहराई से जांच की जाएगी। अब इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई में होगी।

क्या है CBSE की नई 3 भाषा नीति?

CBSE द्वारा लागू की जा रही नई भाषा नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCF-SE) 2023 के आधार पर तैयार की गई है। इसके तहत माध्यमिक स्तर यानी कक्षा 9 से छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। इनमें कम से कम दो भारतीय भाषाओं का होना अनिवार्य रहेगा।

इसका मतलब यह है कि जो छात्र अब तक फ्रेंच, जर्मन या अन्य विदेशी भाषाओं को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ रहे थे, उन्हें अब भारतीय भाषाओं का विकल्प चुनना पड़ सकता है। यही कारण है कि कई स्कूलों, छात्रों और अभिभावकों में चिंता का माहौल बन गया है।

छात्रों और अभिभावकों की चिंता क्यों बढ़ी?

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि सत्र के बीच इस तरह की नई नीति लागू करना लाखों छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव डाल सकता है। खासतौर पर वे छात्र, जिन्होंने वर्षों से विदेशी भाषा को अपनी दूसरी भाषा के रूप में चुना हुआ है, उन्हें अचानक बदलाव का सामना करना पड़ेगा।

अभिभावकों का कहना है कि बच्चों ने पहले से विदेशी भाषाओं में तैयारी की हुई है। ऐसे में अचानक भारतीय भाषा में शिफ्ट होना उनके परीक्षा परिणाम और भविष्य की पढ़ाई पर असर डाल सकता है। कई निजी स्कूलों में फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाओं की पढ़ाई लंबे समय से हो रही है और छात्रों ने उसी आधार पर अपने करियर की दिशा तय की है।

CBSE ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

CBSE ने कोर्ट में अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने और छात्रों को देश की भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता से जोड़ने के उद्देश्य से उठाया गया है। बोर्ड का कहना है कि नई शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन पर जोर देती है।

CBSE के अनुसार, भारतीय भाषाओं के अध्ययन से छात्रों में स्थानीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक जुड़ाव की समझ मजबूत होगी। बोर्ड ने यह भी कहा कि शिक्षा केवल करियर तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि छात्रों को देश की जड़ों से जोड़ना भी जरूरी है।

क्या यह नीति सभी स्कूलों पर लागू होगी?

CBSE से संबद्ध सभी स्कूलों को इस नई नीति के अनुसार अपने पाठ्यक्रम में बदलाव करने होंगे। हालांकि कई स्कूलों ने इस पर व्यावहारिक कठिनाइयों का हवाला दिया है। कुछ स्कूलों में पर्याप्त भाषा शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, जबकि कई छात्रों के लिए अचानक भाषा बदलना आसान नहीं होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि नीति का उद्देश्य अच्छा हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका और समय बेहद महत्वपूर्ण है। अगर छात्रों को पर्याप्त समय और संसाधन नहीं दिए गए, तो यह उनके लिए परेशानी का कारण बन सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नीति पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन केंद्र सरकार, CBSE और NCERT से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत अब जुलाई में इस मामले की अगली सुनवाई करेगी।

शिक्षा जगत से जुड़े लोग मानते हैं कि यह मामला आने वाले समय में देश की शिक्षा नीति और भाषा व्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है। छात्रों, अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हुई हैं।

CBSE की नई 3 भाषा नीति ने शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार और CBSE इसे भारतीय भाषाओं के संरक्षण और सांस्कृतिक जुड़ाव के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ छात्र और अभिभावक इसे अचानक लागू किया गया फैसला मान रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई यह तय करेगी कि यह नीति शिक्षा व्यवस्था में किस दिशा में बदलाव लाती है।

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