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मधेपुरा का रहस्य: लालू के गढ़ में RJD क्यों फिसलती रही?

समाजवाद की धरती, पर RJD की हार: मधेपुरा की राजनीति का पहेली

मधेपुरा: लालू यादव के गढ़ में क्यों नहीं जीत पाती RJD?

मधेपुरा को हमेशा से समाजवादियों की धरती माना गया है। यदि इस इलाके में पत्थर फेंका जाए, तो उसकी अस्सी प्रतिशत संभावना होती है कि वह किसी समाजवादी नेता पर ही गिरे। बीएन मंडल, शरद यादव, लालू यादव जैसे बड़े नेता इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ते आए हैं और जीतते भी रहे हैं। डॉ. भूपेंद्र मधेपुरी कहते हैं कि यही मधेपुरा का असली परिचय है।

मधेपुरा में समाजवादी विचारों का असर पुराने समय से रहा है। भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. श्रीमंत जैनेन्द्र बताते हैं कि इस इलाके में बुद्ध के प्रभाव ने समाजवादी विचारधारा को मजबूत किया। अंग प्रदेश से प्रस्थान के बाद बुद्ध और उनके अनुयायी इस क्षेत्र में आए, जहां कई बौद्ध मठ भी थे। इस वजह से मधेपुरा का पूरा इलाका बौद्ध धर्म और उसके आदर्शों से प्रभावित रहा, जिससे समाजवाद की जड़ें यहां गहरी हो गईं। हालांकि, इस ऐतिहासिक विरासत की चर्चा बहुत कम होती है। मधेपुरा की पहचान अक्सर “रोम पोप का, मधेपुरा गोप का” जैसे लोकप्रिय नारे से ही होती है, जो यहां के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य को दर्शाता है।

दिलचस्प बात यह है कि मधेपुरा में पिछले पांच विधानसभा चुनावों में राजद (RJD) कभी भी जदयू (JDU) के मुकाबले ज्यादा सीटें जीतने में सफल नहीं हो पाई, जबकि यादव समुदाय को राजद का सबसे बड़ा वोट बैंक माना जाता है। 2020 के विधानसभा चुनाव में मधेपुरा जिले की चार सीटों में से राजद ने दो सीटें जीतीं और जदयू ने भी दो सीटें जीतीं। यह संतुलन इस बात का संकेत था कि राजद का प्रदर्शन बेहतर जरूर हुआ, लेकिन पूरी तरह से जीत हासिल नहीं कर पाई।

2015 के चुनावों में जदयू ने तीन सीटें जीतीं, जबकि राजद ने केवल एक सीट पर जीत दर्ज की। इसी प्रकार 2010 में भी जदयू का पलड़ा भारी रहा। फरवरी 2005 के चुनाव में मधेपुरा की पांच में से चार सीटों पर जदयू ने कब्जा जमाया था और राजद ने सिर्फ एक सीट जीती। वहीं, नवंबर 2005 के चुनाव में जदयू ने पूरी तरह से मधेपुरा में अपने दबदबे को कायम रखा।

2020 के चुनाव में प्रो. चंद्रशेखर ने जदयू के निखिल मंडल और जाप के पप्पू यादव को हराया। वहीं, सिंगहेश्वर से चंद्रहास चौपाल चुनाव जीतकर आए। जदयू ने आलमनगर और बिहारीगंज सीटों पर भी कब्जा जमाया। नरेंद्र नारायण यादव और निरंजन मेहता भी जीत हासिल करने वाले उम्मीदवार थे। परिसीमन के बाद से जदयू ने इन दोनों सीटों पर कभी हार नहीं मानी है।

इस प्रकार मधेपुरा, जो समाजवादी विचारों की गढ़ रही है, वहां राजद की पकड़ मजबूत होने के बावजूद जदयू का दबदबा काफी मजबूत दिखाई देता है। इसका मुख्य कारण स्थानीय सामाजिक-राजनैतिक समीकरण और जदयू की संगठनात्मक ताकत है, जो राजद के मुकाबले अधिक प्रभावी साबित हुई है। मधेपुरा की राजनीतिक तस्वीर बताती है कि केवल जातीय पहचान या ऐतिहासिक विरासत ही चुनाव जीतने के लिए काफी नहीं होती, बल्कि स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन, उम्मीदवार की लोकप्रियता और चुनावी रणनीति भी निर्णायक भूमिका निभाती है।

इसलिए, मधेपुरा में राजद की हार का कारण केवल यादव वोटों का बंटवारा नहीं बल्कि जदयू की सशक्तता और बेहतर चुनाव प्रबंधन भी माना जा सकता है। यह क्षेत्र हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है, और यहां के मतदाता भी समय-समय पर अपनी पसंद को बदलते रहे हैं। मधेपुरा की राजनीति को समझने के लिए इन सभी पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

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