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बिहार चुनाव में चुपचाप हो रहा है बड़ा खेल… किसके साथ जाएंगी महिलाएं?

राजनीति में आया नया मोड़, बिहार में महिलाएं रचेंगी जीत-हार की कहानी?

बिलकुल! नीचे आपके द्वारा दिए गए विषय पर आधारित 500 शब्दों का बदला गया और प्रभावशाली हिंदी लेख प्रस्तुत है, जो बिहार चुनावों में महिलाओं की भूमिका, नीतीश कुमार की रणनीति और विपक्ष की सुस्ती पर केंद्रित है:


बिहार चुनाव 2025: निर्णायक होंगी महिलाएं, लेकिन विपक्ष क्यों है धीमा?

जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है। सभी दल अपने-अपने एजेंडे को जनता के सामने रखने की तैयारी में हैं, लेकिन इस बार असली प्रश्न यह है कि चुनावी लड़ाई में निर्णायक भूमिका कौन निभाएगा? पिछले कुछ चुनावों की बात करें, तो इसका जवाब साफ है — बिहार की महिलाएं

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस सच्चाई को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक करियर में महिलाओं को ध्यान में रखते हुए कई योजनाएं लागू की हैं, जिनका सीधा असर उनके वोट बैंक पर पड़ा है। शराबबंदी, साइकिल योजना, कन्या उत्थान योजना, पंचायतों में 50% आरक्षण — ये सब योजनाएं महिलाओं को सशक्त बनाने के साथ-साथ उन्हें सत्ता निर्धारण में एक चुपचाप लेकिन ताकतवर भूमिका में ले आई हैं।

नीतीश कुमार की रणनीति यह रही है कि वे महिलाओं के बीच ऐसी सामाजिक क्रांति को जन्म दें, जो बिना शोर-शराबे के राजनीतिक समीकरणों को पलट दे। यही कारण है कि बिहार में अब सिर्फ जातीय गणित से चुनाव नहीं जीते जा सकते। महिलाएं अब केवल सहायक नहीं रहीं, वे सीधे तौर पर निर्णायक मतदाता बन चुकी हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में महिला मतदाताओं की यह “साइलेंट क्रांति” अब मुख्यधारा की राजनीति को दिशा देने लगी है। वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र नाथ तिवारी के अनुसार, नीतीश की महिला-केंद्रित नीतियों ने कई बार जातीय समीकरणों को दरकिनार कर सत्ता की दिशा तय की है।

लेकिन इस सबके बीच सवाल यह भी उठता है कि विपक्ष, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस, इस मोर्चे पर क्यों पिछड़ते नजर आ रहे हैं? इन दलों ने अब तक महिला वोटर्स को लुभाने के लिए कोई खास या अलग रणनीति नहीं अपनाई है। उनके चुनावी घोषणापत्रों में महिलाओं के लिए ठोस योजनाएं कम ही दिखती हैं। यही वजह है कि जहां नीतीश महिलाओं के बीच अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहे हैं, वहीं विपक्ष अब भी पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति में उलझा हुआ है।

निष्कर्ष:


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