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“क्या जेडीयू की ‘बड़े भाई’ बनने की ज़िद से फटेगा NDA?”

उपेंद्र कुशवाहा की नाराज़गी कहीं NDA के लिए खतरे की घंटी तो नहीं?

बिहार चुनाव 2025: जेडीयू को ‘बड़ा भाई’ मानने को क्यों तैयार नहीं उपेंद्र कुशवाहा? NDA में खींचतान तेज

बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। खासकर एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के भीतर सीट बंटवारे को लेकर खींचतान साफ नजर आ रही है। गठबंधन के सभी दल अधिक से अधिक सीटें पाना चाहते हैं और इसी वजह से जेडीयू और उपेंद्र कुशवाहा के बीच ‘बड़े भाई’ की भूमिका को लेकर टकराव देखने को मिला है।

बीते बुधवार को जेडीयू के वरिष्ठ नेता और बिहार सरकार में मंत्री श्रवण कुमार ने यह दावा किया कि आने वाले विधानसभा चुनाव में जेडीयू बड़े भाई की भूमिका निभाएगा। यानी सीट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर जेडीयू खुद को प्रमुख ताकत मानता है। लेकिन जेडीयू के इस दावे पर राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “कौन बड़ा भाई होगा, ये जब तय होगा तब तय होगा।” उनकी इस टिप्पणी से साफ है कि वह जेडीयू की इस ‘वरिष्ठता’ को सहज रूप से स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

उपेंद्र कुशवाहा के विरोध के पीछे राजनीतिक गणित है। वह कोइरी (कुशवाहा) समाज से आते हैं, जो कि बिहार की राजनीति में एक मजबूत और निर्णायक ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) समुदाय है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से एनडीए का वोट बैंक रहा है, लेकिन हाल के चुनावों में इसमें बदलाव देखा गया।

2024 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन ने इस वर्ग को साधने के लिए 6 कुशवाहा उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इसका असर भी देखने को मिला और कुशवाहा वोटों का एक बड़ा हिस्सा महागठबंधन की ओर खिसक गया। यही कारण था कि बीजेपी ने चुनावी हार के बावजूद उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा, ताकि कुशवाहा समाज को फिर से अपने पाले में लाया जा सके।

एनडीए जानता है कि बिहार में कुशवाहा समाज के वोट बेहद निर्णायक हो सकते हैं। खासकर उस स्थिति में जब महागठबंधन यादव और मुस्लिम वोटों के साथ इस वर्ग को भी जोड़ने की कोशिश कर रहा है। अगर कुशवाहा वोटर एनडीए से पूरी तरह खिसक जाते हैं, तो सीटों की संख्या पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। इसलिए उपेंद्र कुशवाहा को नज़रअंदाज़ करना गठबंधन के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

उपेंद्र कुशवाहा की नाराज़गी सिर्फ ‘बड़े भाई’ शब्द से नहीं है, बल्कि उनकी राजनीतिक हैसियत को कमतर आंकने की कोशिश को लेकर भी है। उनका मानना है कि जब वह एनडीए के लिए एक अहम सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो उन्हें भी फैसलों में बराबर की भागीदारी मिलनी चाहिए।

जेडीयू की तरफ से खुद को ‘बड़ा भाई’ कहने का मतलब सिर्फ सीटों की संख्या में बढ़त नहीं, बल्कि नेतृत्व की कमान भी अपने हाथ में रखना है। यही बात उपेंद्र कुशवाहा को खटक रही है, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक पकड़ और मोलभाव की ताकत कमजोर हो सकती है।

अभी विधानसभा चुनाव में वक्त है, लेकिन एनडीए के भीतर यह खींचतान आने वाले समय में सीट शेयरिंग को लेकर बड़ा मुद्दा बन सकती है। अगर समय रहते इसे सुलझाया नहीं गया, तो इसका फायदा विपक्ष को मिल सकता है।

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