क्या बच्चों में संस्कृति की लौ जलाकर बनेगा भारत ‘विश्वगुरु’?

RSS के 100 वर्ष: बच्चों में सांस्कृतिक गर्व जगाने की दिशा में नई पहल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना को इस वर्ष 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं, और इस ऐतिहासिक अवसर पर संगठन द्वारा देशभर में विविध कार्यक्रम और अभियानों की शुरुआत की जा रही है। इसी क्रम में गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति रवि कुमार त्रिपाठी ने संघ की इस शताब्दी वर्ष पर एक महत्वपूर्ण विचार साझा किया है, जो देश की अगली पीढ़ी को सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मूल्यों से जोड़ने की दिशा में एक सार्थक प्रयास माना जा रहा है।
बच्चों तक पहुंचे सांस्कृतिक मूल्यों की गूंज
पूर्व न्यायमूर्ति त्रिपाठी ने कहा कि इस वर्ष संघ ने संकल्प लिया है कि उसकी विचारधारा और सांस्कृतिक मूल्यों को बच्चों तक और गहराई से पहुँचाया जाएगा। यह सिर्फ एक वैचारिक पहल नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और शैक्षणिक आंदोलन का रूप ले रहा है। उनका मानना है कि बच्चों के मन में अगर शुरू से ही अपनी संस्कृति, परंपरा और स्वदेशी उत्पादों के प्रति गर्व की भावना विकसित की जाए, तो वे जीवनभर उस सोच को आत्मसात करेंगे और देश को एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ाएंगे।
विश्वगुरु बनने की दिशा में कदम
रवि कुमार त्रिपाठी ने यह भी कहा कि “जब बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ा जाएगा और उन्हें बताया जाएगा कि भारतीय संस्कृति कितनी समृद्ध, प्राचीन और वैज्ञानिक रही है, तब वे खुद को न केवल भारतीय कहने में गर्व महसूस करेंगे बल्कि विश्व को भी भारतीय विचारधारा का महत्व समझा पाएंगे।”
उनके अनुसार, यह पहल भारत को पुनः ‘विश्वगुरु’ बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है। संघ का मानना है कि भौतिक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और नैतिक विकास भी जरूरी है, और इसकी शुरुआत बालमन से ही करनी होगी।
नई पीढ़ी के लिए नई दिशा
संघ की यह योजना केवल विचार स्तर पर नहीं रुकी है। स्कूलों, बालसंस्कार केंद्रों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के माध्यम से बच्चों को स्वदेशी उत्पादों के उपयोग, भारतीय इतिहास, महान व्यक्तित्वों और सांस्कृतिक विरासत के बारे में जानकारी देने के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। यह कदम नई पीढ़ी को ‘राष्ट्र पहले’ की सोच से जोड़ने का प्रयास है।