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वोटर लिस्ट का खेल: जहां जुड़े नए चेहरे, वहीं गायब हुए हजारों नाम!

कहीं नाम जुड़ गए, कहीं नाम मिटा दिए गए – वोटर लिस्ट में कौन है असली खिलाड़ी?

बिहार वोटर लिस्ट विश्लेषण: मगध में नए वोटर जुड़ने और सीमांचल में नाम हटाए जाने के सियासी मायने

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद जारी की गई अंतिम वोटर लिस्ट ने आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। इस सूची के अनुसार बिहार में कुल 7.42 करोड़ पात्र मतदाता हैं, जिसमें ड्राफ्ट से अंतिम सूची तक लगभग 18 लाख नए वोटर जुड़े हैं। यह आंकड़ा न केवल प्रशासनिक बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी काफी अहम माना जा रहा है, खासकर एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) और महागठबंधन (MGB) की रणनीतियों के लिहाज से।

मगध: एनडीए की कमजोर कड़ी में नया जोश?

अगर क्षेत्रवार समीक्षा की जाए, तो सबसे दिलचस्प आंकड़े मगध क्षेत्र से सामने आए हैं। यहां सबसे ज्यादा नए मतदाता जुड़े हैं, जो अपने आप में खास बात है क्योंकि मगध को एनडीए की कमजोर कड़ी माना जाता है। मगध में 2020 के चुनाव में महागठबंधन को अपेक्षाकृत बेहतर सफलता मिली थी। ऐसे में नए मतदाताओं का जुड़ना दोनों गठबंधनों के लिए चुनौती और अवसर दोनों लेकर आया है।
यह देखा गया है कि नए वोटर आमतौर पर युवा होते हैं, जिनका झुकाव अक्सर बदलाव की ओर होता है। अब देखना होगा कि इन युवा वोटरों की प्राथमिकताएं किसके पक्ष में जाती हैं।

सीमांचल: मुस्लिम बहुल क्षेत्र में सबसे ज्यादा नाम कटे

दूसरी ओर, बिहार के मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र से एक बिल्कुल विपरीत तस्वीर सामने आई है। इस इलाके में औसतन 7.7% वोटरों के नाम हटाए गए हैं, जो कि राज्य के औसत 5.9% से काफी अधिक है।
जिलेवार आंकड़े इस प्रकार हैं:

  • किशनगंज: 9.69% नाम हटे
  • पूर्णिया: 8.41%
  • कटिहार: 7.12%
  • अररिया: 5.6%

ये सभी जिले सीमांचल क्षेत्र का हिस्सा हैं, और आमतौर पर महागठबंधन या सेक्युलर पार्टियों का गढ़ माने जाते हैं। ऐसे में नामों के कटने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं — क्या यह सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई राजनीतिक गणित भी है?

गोपालगंज: सबसे ज्यादा नाम हटाए गए

गोपालगंज जिले में 12.13% नाम हटा दिए गए हैं, जो राज्य में सबसे अधिक है। यहां कुल 6 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 4 पर 2020 में एनडीए ने जीत दर्ज की थी। इतनी बड़ी संख्या में नाम हटना स्थानीय प्रशासन की निष्पक्षता और SIR की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर सकता है।

राजनीतिक असर

बिहार की राजनीति जातीय और धार्मिक समीकरणों पर आधारित रही है। इस वोटर लिस्ट से दो बड़े संकेत मिलते हैं:

  1. एनडीए को मगध में अवसर मिला है, यदि वह नए युवा वोटरों को अपने पक्ष में मोड़ सके।
  2. महागठबंधन को सीमांचल में नुकसान हो सकता है, खासकर अगर नाम कटने की प्रक्रिया में अल्पसंख्यक वोटर्स disproportionately प्रभावित हुए हों।

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