यूक्रेन: और रूस के बीच जारी युद्ध का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। यूक्रेन द्वारा हाल के दिनों में किए गए ड्रोन हमलों ने रूस के तेल बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है, जिसके बाद मॉस्को अपने कच्चे तेल के निर्यात में बड़ी कटौती करने की तैयारी कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूस से तेल आपूर्ति घटती है तो इसका असर केवल यूरोप या पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रहेगा। भारत जैसे देशों को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि पिछले दो वर्षों में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है।
रूस के तेल केंद्रों पर यूक्रेन के हमले
हाल के हफ्तों में यूक्रेन ने रूस के कई महत्वपूर्ण तेल और ईंधन ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें नोवोरोस्सिय्स्क के पास स्थित ग्रुशोवाया ऑयल ट्रांसशिपमेंट बेस भी शामिल है, जिसे दक्षिणी रूस के प्रमुख तेल निर्यात केंद्रों में गिना जाता है।
रिपोर्टों के मुताबिक इस हमले के बाद वहां आग लग गई थी। इसके अलावा वोल्गोग्राद क्षेत्र और क्रीमिया में मौजूद ईंधन भंडारण केंद्रों को भी निशाना बनाया गया।
इन हमलों का मकसद रूस की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को कमजोर करना माना जा रहा है, ताकि युद्ध के दौरान उसकी आर्थिक और सैन्य क्षमता पर दबाव बढ़ाया जा सके।
जून में घट सकता है तेल निर्यात
रूस के पश्चिमी बंदरगाहों से होने वाले कच्चे तेल के निर्यात में इस महीने उल्लेखनीय गिरावट आने की संभावना है।
जानकारों के अनुसार जून में प्रिमॉर्स्क, उस्त-लूगा और नोवोरोस्सिय्स्क जैसे प्रमुख बंदरगाहों से निर्यात घटकर करीब 17 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है। मई में यही आंकड़ा लगभग 25 लाख बैरल प्रतिदिन था।
यानी एक महीने के भीतर निर्यात में भारी कमी दर्ज की जा सकती है।

घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता
रूस इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ तेल प्रतिष्ठानों पर हमले हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर ईंधन की मांग बढ़ रही है।
इसी वजह से रूस सरकार घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए अधिक कच्चे तेल को देश के भीतर ही इस्तेमाल करने की योजना बना रही है।
बताया जा रहा है कि जून के दौरान रूस अपनी रिफाइनरियों में तेल प्रोसेसिंग क्षमता को 2.5 लाख से 4 लाख बैरल प्रतिदिन तक बढ़ा सकता है। इसका सीधा मतलब है कि निर्यात के लिए उपलब्ध तेल की मात्रा और कम हो सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है रूसी तेल?
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद में तेजी लाई थी। आज रूस भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है।
उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा रूस से खरीद रहा है।
मई महीने में भारत का रूसी तेल आयात फरवरी की तुलना में करीब 63 प्रतिशत तक बढ़ गया था। ऐसे में रूस की आपूर्ति में किसी भी तरह की कमी का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ सकता है।
क्या महंगा हो सकता है पेट्रोल और डीजल?
यदि रूस से आने वाली तेल आपूर्ति कम होती है तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से अधिक कीमत पर तेल खरीदना पड़ सकता है।
इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। तेल महंगा होने का असर पेट्रोल, डीजल, हवाई ईंधन और परिवहन लागत पर दिखाई दे सकता है।
इसके साथ ही महंगाई बढ़ने का जोखिम भी पैदा हो सकता है, क्योंकि ऊर्जा लागत बढ़ने से कई अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें भी प्रभावित होती हैं।
वैश्विक बाजार की नजर रूस पर
ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले सप्ताहों में रूस के तेल उत्पादन और निर्यात के आंकड़ों पर दुनिया भर की नजर रहेगी।
यदि यूक्रेन के हमले जारी रहते हैं और रूस घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देता है, तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। ऐसे हालात में भारत समेत कई एशियाई देशों को अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
यूक्रेन के ड्रोन हमलों ने रूस के तेल निर्यात तंत्र पर नया दबाव बना दिया है। रूस यदि निर्यात में कटौती करता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ-साथ भारत पर भी पड़ सकता है। फिलहाल स्थिति पर करीबी नजर रखी जा रही है, लेकिन तेल आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा बनी रही तो भारत के लिए ऊर्जा लागत और महंगाई दोनों बड़ी चुनौती बन सकती हैं।