नई दिल्ली: देश की राजनीति में अगले कुछ वर्षों के दौरान बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। केंद्र सरकार कथित तौर पर 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और चुनावी ढांचे में व्यापक सुधार लागू करने की दिशा में सक्रिय हो गई है। सूत्रों के अनुसार, सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी करने के बजाय राजनीतिक सहमति बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।
इसी क्रम में विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ संवाद और परामर्श का दौर शुरू हो चुका है। माना जा रहा है कि यदि व्यापक सहमति बन जाती है, तो देश के संसदीय प्रतिनिधित्व और चुनावी व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
आखिर क्या है परिसीमन?
परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या और जनसांख्यिकीय बदलावों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों का पुनर्निर्धारण करना। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व उसकी जनसंख्या के अनुपात में हो।
भारत में परिसीमन प्रक्रिया समय-समय पर होती रही है, लेकिन कई दशकों से यह विषय राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बना हुआ है। विभिन्न राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर में अंतर होने के कारण परिसीमन का सीधा असर संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है।
क्यों संवेदनशील है यह मुद्दा?
परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत और कुछ अन्य राज्यों ने पहले भी अपनी चिंताएं जताई हैं। इन राज्यों का तर्क रहा है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है, इसलिए नई सीटों के पुनर्वितरण में उनका प्रतिनिधित्व कम नहीं होना चाहिए।
दूसरी ओर, अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का मानना है कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए। यही कारण है कि परिसीमन का मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील माना जाता है।

क्षेत्रीय दलों को साथ लेने की कोशिश
सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार इस बार किसी भी प्रकार के राजनीतिक टकराव से बचना चाहती है। इसलिए द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), तृणमूल कांग्रेस (TMC) और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ बातचीत का दौर शुरू किया गया है।
इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य राज्यों की आशंकाओं को समझना और ऐसा साझा मॉडल तैयार करना है जिसे अधिकतम राजनीतिक समर्थन मिल सके। सरकार की रणनीति यह बताई जा रही है कि संसद में किसी भी विधेयक को पेश करने से पहले व्यापक राजनीतिक सहमति सुनिश्चित की जाए।
‘एक देश, एक चुनाव’ भी एजेंडे में
परिसीमन के साथ-साथ केंद्र सरकार “एक देश, एक चुनाव” (One Nation, One Election) की अवधारणा पर भी आगे बढ़ रही है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराना है ताकि चुनावी खर्च कम हो और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके।
सरकार का मानना है कि बार-बार होने वाले चुनाव विकास कार्यों और प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं। हालांकि विपक्षी दलों और कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव पर विभिन्न सवाल उठाए हैं।
सूत्रों का कहना है कि क्षेत्रीय दलों के साथ होने वाली बैठकों में परिसीमन और एक देश, एक चुनाव दोनों मुद्दों पर चर्चा की जा रही है।
2029 से पहले बदल सकती है राजनीतिक तस्वीर
यदि सरकार राजनीतिक दलों को विश्वास में लेने में सफल रहती है और आवश्यक संवैधानिक एवं विधायी प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं, तो 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के चुनावी मानचित्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
नई सीटों का निर्धारण, संसदीय क्षेत्रों का पुनर्गठन और चुनावी कैलेंडर में संभावित बदलाव देश की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं। हालांकि फिलहाल कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और बातचीत का दौर जारी है।
विपक्ष की संभावित भूमिका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन और एक देश, एक चुनाव जैसे मुद्दों पर विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। कई क्षेत्रीय दल अपने राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए इन प्रस्तावों पर विस्तृत चर्चा और स्पष्ट आश्वासन की मांग कर सकते हैं।
यही वजह है कि सरकार फिलहाल सहमति आधारित दृष्टिकोण अपनाती दिखाई दे रही है।
2029 के आम चुनावों से पहले केंद्र सरकार चुनावी और संसदीय ढांचे में बड़े बदलावों की संभावनाओं पर काम कर रही है। परिसीमन विधेयक और “एक देश, एक चुनाव” जैसे प्रस्ताव भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकते हैं। हालांकि इन संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम फैसला राजनीतिक सहमति, संवैधानिक प्रक्रियाओं और सभी हितधारकों के बीच बनने वाले साझा दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा। आने वाले महीनों में इस विषय पर होने वाली राजनीतिक गतिविधियां राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख केंद्र बन सकती हैं।